
कुल्लू। भगवान रघुनाथ की नगरी कुल्लू में अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव की तैयारियां तेज हो गई हैं। 21 से 27 अक्तूबर तक ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में देव आस्था, हिमाचली संस्कृति और व्यापार का अनूठा संगम देखने को मिलेगा। इस बार उत्सव में रिकॉर्ड 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा गया है। वहीं, मेले में 2,500 से अधिक दुकानें सजने और करीब 300 करोड़ रुपये के कारोबार की उम्मीद है।
कुल्लू दशहरा में शामिल होने के लिए बाह्य सराज के आनी-निरमंड क्षेत्र से कई देवी-देवता 150 से 200 किलोमीटर तक की दूरी पैदल तय कर पहुंचेंगे। इस क्षेत्र के करीब 15 से 20 देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा गया है। उत्सव में शामिल होने वाले लगभग 25 से 30 प्रतिशत देवी-देवता 100 किलोमीटर या इससे अधिक दूरी तय करेंगे।
20 अक्तूबर से देवी-देवताओं का आगमन शुरू होने की उम्मीद है। इसके साथ ही ढालपुर मैदान में अस्थायी शिविर सजने लगेंगे। सात दिनों तक देवलू और कारकून अपने आराध्य के साथ टेंटों में रहकर सुबह-शाम पूजा-अर्चना करेंगे और पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन करेंगे।
दशहरा उत्सव समिति ने इस बार 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा है, जबकि वर्ष 2025 में 332 देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया था। इस तरह इस बार पिछले साल के मुकाबले 15 अधिक देवी-देवताओं को न्योता दिया गया है। भगवान रघुनाथ की रथयात्रा और सैकड़ों देवी-देवताओं का एक साथ जुटना उत्सव का मुख्य आकर्षण रहेगा।
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा धार्मिक आयोजन के साथ बड़े व्यापारिक मेले के रूप में भी पहचान रखता है। इस बार 2,500 से अधिक दुकानें लगने और करीब 300 करोड़ रुपये के कारोबार का अनुमान है। देश के विभिन्न हिस्सों से व्यापारी यहां पहुंचेंगे। मेले में कपड़े, बर्तन, घरेलू सामान सहित कई तरह के उत्पादों की खरीदारी होगी।
उत्सव में पर्यटकों की आवाजाही से स्थानीय पर्यटन कारोबार और अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। देव संस्कृति, लोक परंपराओं और व्यापार का यह संगम हर साल देश-विदेश से आने वाले लोगों को आकर्षित करता है।
कुल्लू में भगवान रघुनाथ के सम्मान में दशहरा मनाने की परंपरा वर्ष 1660 से जुड़ी मानी जाती है। मान्यता के अनुसार, राजा जगत सिंह के शासनकाल में प्रायश्चित के लिए गुरु के निर्देश पर दामोदर दास गोसाईं अयोध्या से भगवान राम और माता सीता की मूर्तियां कुल्लू लेकर आए थे। आश्विन की दशमी को भगवान रघुनाथ की अध्यक्षता में यज्ञ हुआ और इसी परंपरा को कुल्लू दशहरे की शुरुआत से जोड़ा जाता है।
भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेंद्र सिंह के अनुसार, कुल्लू में दशहरा वर्ष 1660 से मनाया जा रहा है। करीब 366 साल पुरानी यह परंपरा आज भी कुल्लू की देव संस्कृति, आस्था और सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा बनी हुई है।
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