
सोलन: हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले के बातल गांव में मनाया जाने वाला ऐतिहासिक दशहरा अपनी अनूठी परंपराओं के लिए खास पहचान रखता है। करीब 600 वर्षों से मनाए जा रहे इस उत्सव में आज भी राजाओं के शासनकाल से जुड़ी रस्में निभाई जाती हैं। यहां रावण दहन से पहले बंदूक से ‘पाप के घड़े’ को निशाना लगाने की परंपरा निभाई जाती है। सरकारी दस्तावेजों में इस मेले का उल्लेख वर्ष 1908 से मिलता है।
दशहरे के अवसर पर अर्की बाजार स्थित भगवान लक्ष्मी नारायण मंदिर से ठाकुर जी की सजी हुई पालकी के साथ शोभायात्रा निकाली जाती है। यह यात्रा गाहर होते हुए करीब चार किलोमीटर लंबे जंगल के रास्ते बातल गांव पहुंचती है। गांव में ग्रामीण पालकी का स्वागत करते हैं। इसके बाद पूजा-अर्चना और पारंपरिक धार्मिक रस्में निभाई जाती हैं।
बातल दशहरे की सबसे खास परंपरा ‘पाप के घड़े’ को बंदूक से निशाना लगाकर फोड़ना है। पंचायत प्रधान उर्मिला शर्मा के अनुसार, राजाओं के शासनकाल से चली आ रही इस परंपरा को आज भी राजपरिवार निभाता है। घड़े को पाप का प्रतीक माना जाता है और इसे तोड़ना असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है।
राजपरिवार की ओर से निशाना लगाने के बाद अन्य लोग भी इस रस्म में हिस्सा लेते हैं। इसके बाद रावण के पुतले का दहन किया जाता है। यही परंपरा बातल के दशहरे को अलग पहचान देती है।
दो दिवसीय मेले में दिन के समय खेल प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं, जबकि शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। इनमें स्थानीय कलाकारों के साथ दूसरे राज्यों से आए कलाकार भी प्रस्तुतियां देते हैं। मेले में गजल गायक चंदन दास, अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन सहित कई कलाकार प्रस्तुति दे चुके हैं। प्रसिद्ध नृत्यांगना शोभना नारायण भी यहां अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी हैं।
स्थानीय निवासी शांति स्वरूप के अनुसार, क्षेत्र में रावण दहन की परंपरा की शुरुआत बातल से हुई थी, जिसके बाद यह अन्य स्थानों तक पहुंची। राजपरिवार से जुड़ी रस्मों, ऐतिहासिक मान्यताओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के चलते बातल का दशहरा आज भी क्षेत्र की पारंपरिक विरासत का अहम हिस्सा बना हुआ है।