
शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने वर्ष 2012 के चंबा बस हादसे से जुड़ी 110 अपीलों का निपटारा करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बस में क्षमता से अधिक यात्रियों का होना अपने आप में बीमा पॉलिसी का ऐसा मौलिक उल्लंघन नहीं है, जिससे बीमा कंपनी मुआवजा देने की जिम्मेदारी से बच सके।
न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की अदालत ने ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी की दलीलों को खारिज करते हुए हादसे के पीड़ितों और उनके आश्रितों के मुआवजे में बढ़ोतरी की है। अदालत ने सभी मामलों को 7.5 प्रतिशत वार्षिक संशोधित ब्याज के साथ निपटाने के निर्देश दिए हैं।
मामला 11 अगस्त 2012 का है, जब मिंजर मेले के लिए जा रही यात्रियों से भरी बस चंबा के मैगजीन मोड़ के पास अनियंत्रित होकर गहरी खाई में गिर गई थी। हादसे में 53 लोगों की मौत और 40 यात्री घायल हुए थे। बस की स्वीकृत क्षमता 44 यात्रियों की थी, जबकि हादसे के समय उसमें 93 लोग सवार थे।
बीमा कंपनी ने ओवरलोडिंग को पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन बताते हुए मुआवजे की देनदारी से इनकार किया था। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि बीमा कंपनी स्वीकृत क्षमता के अनुरूप दावों का भुगतान करेगी। शेष दावों का भुगतान भी पहले बीमा कंपनी को करना होगा, जिसके बाद वह नियमानुसार वाहन मालिक से राशि वसूल सकती है।
एक मामले में पूर्ण शारीरिक दिव्यांगता का सामना कर रहे गुड्डू के मुआवजे को हाईकोर्ट ने 14.80 लाख रुपये से बढ़ाकर 87,36,184 रुपये कर दिया। अदालत ने कहा कि मुआवजा पीड़ित को गरिमापूर्ण जीवन जीने में वास्तविक सहायता देने वाला होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने पूर्व प्रशासनिक ट्रिब्यूनल से हाईकोर्ट में शामिल हुए कर्मचारियों की वरिष्ठता और पदोन्नति से जुड़े 22वें संशोधन नियम, 2024 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश योगेश जसवाल की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए नियम को असंवैधानिक या मनमाना मानने से इनकार किया।
अदालत ने याचिकाकर्ता हेमंत शर्मा को मानवीय आधार पर राहत देते हुए उनके सेवानिवृत्ति लाभ और पेंशन को डिप्टी रजिस्ट्रार के पद के आधार पर देने के निर्देश दिए हैं।
एक अन्य मामले में हाईकोर्ट ने बिजली बोर्ड के जूनियर टीमेट पद की सीधी भर्ती के लिए अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष से घटाकर 30 वर्ष करने के फैसले को वैध ठहराया है। अदालत ने कहा कि किसी पद की योग्यता, आयु सीमा और अन्य सेवा शर्तें तय करना नियोक्ता के नीतिगत अधिकार क्षेत्र में आता है।
न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश योगेश जसवाल की पीठ ने बलवंत सिंह और अन्य की याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक मामले में भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि पत्नी पर व्यभिचार का केवल मौखिक आरोप लगाकर पति भरण-पोषण देने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।
मामले में फैमिली कोर्ट चंबा ने पत्नी को 3,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था, जिसे पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। पति ने पत्नी पर दूसरे व्यक्ति के साथ संबंध होने का आरोप लगाया था।
अदालत ने पाया कि इस आरोप को साबित करने के लिए महत्वपूर्ण गवाह बताई गई बेटी का बयान ही दर्ज नहीं करवाया गया। इसके आधार पर हाईकोर्ट ने पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए भरण-पोषण का आदेश बरकरार रखा।