
कुल्लू। देवभूमि कुल्लू में महिलाएं अब केवल देवी-देवताओं की परंपराओं की साक्षी नहीं, बल्कि देव व्यवस्था के संचालन में भी अहम भूमिका निभा रही हैं। सामाजिक रूढ़ियों को पीछे छोड़कर जिले की छह महिलाएं देवी-देवताओं की कारदार के रूप में जिम्मेदारियां निभा रही हैं। पूजा-पाठ की व्यवस्था से लेकर देव संपत्ति की देखरेख और सदियों पुरानी परंपराओं के संरक्षण तक, महिलाएं हर मोर्चे पर अपनी भूमिका साबित कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में भी महिला कारदारों की भागीदारी देव समाज में बदलती सोच की मिसाल पेश कर रही है।
जिले में कटराईं के देवता वीर नाथ गौहरी की कारदार चंद्रकला कटोच, धाऊगी के देव लक्ष्मी नारायण की कारदार शारदा शर्मा, शांघड़ के देव शंगचूल महादेव की कारदार सुधा शर्मा और राउगी के देव रूमणू नाग की कारदार देवादेई प्रमुख हैं। इसके अलावा देवता सरबल नाग सौर और लरांई महादेव की व्यवस्था की जिम्मेदारी भी महिलाएं संभाल चुकी हैं।
जिला देवी-देवता कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम ठाकुर के अनुसार, देव समाज में कारदार को देवता का प्रतिनिधि माना जाता है। देवता के बाद व्यवस्था प्रबंधन की जिम्मेदारी कारदार पर होती है। पहले यह दायित्व अधिकतर पुरुषों को ही सौंपा जाता था, लेकिन अब महिलाएं भी पूरी निष्ठा से इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।
चंद्रकला कटोच ने देवता के आदेश पर संभाली जिम्मेदारी
देवता वीर नाथ गौहरी की कारदार चंद्रकला कटोच इस बदलाव का उदाहरण हैं। पति के निधन के बाद वर्ष 2019 में उन्हें देवता के आदेश पर कारदार बनाया गया। शुरुआत में उन्होंने दो बार जिम्मेदारी लेने से इनकार किया, लेकिन देव आग्रह के बाद इसे स्वीकार कर लिया। अब वह मंदिर प्रबंधन और देव परंपराओं के निर्वहन की जिम्मेदारी संभाल रही हैं।
सुधा शर्मा आठ वर्षों से निभा रहीं दायित्व
शांघड़ के देव शंगचूल महादेव की कारदार सुधा शर्मा पिछले आठ वर्षों से यह जिम्मेदारी निभा रही हैं। पिता के निधन के बाद उन्हें देव व्यवस्था का दायित्व सौंपा गया। वह स्थानीय देव कार्यों के साथ अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में भी परंपराओं का निर्वहन करती हैं।
शारदा शर्मा 22 वर्षों से संभाल रहीं देव व्यवस्था
धाऊगी के देव लक्ष्मी नारायण की कारदार शारदा शर्मा पिछले 22 वर्षों से देव व्यवस्था का संचालन कर रही हैं। पिता के बाद भाई न होने के कारण उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी। शारदा शर्मा का कहना है कि देवता के आशीर्वाद से वह अपने सभी कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा के साथ कर रही हैं।
कुल्लू की महिला कारदारों की यह भूमिका दर्शाती है कि देव परंपराओं का संरक्षण अब महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के साथ आगे बढ़ रहा है। उनकी जिम्मेदारी न केवल धार्मिक व्यवस्थाओं को संभालने तक सीमित है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में भी महत्वपूर्ण है।