
शिमला: जलवायु परिवर्तन का असर आने वाले दशकों में हिमालयी नदियों के प्रवाह और इन पर निर्भर जलविद्युत परियोजनाओं पर दिखाई दे सकता है। एक नए अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि सदी के अंत तक तापमान में करीब 2.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोतरी हो सकती है। इसके साथ ही बारिश के मौसमी वितरण में भी बड़ा बदलाव आने की आशंका है।
अध्ययन के अनुसार, भविष्य में मानसून के दौरान बारिश में करीब 40 फीसदी तक बढ़ोतरी, जबकि सर्दियों की बारिश में 90 फीसदी तक कमी हो सकती है। मौसम के इस बदलते पैटर्न का सीधा असर हिमालयी नदियों में पूरे वर्ष पानी की उपलब्धता और उनके प्रवाह पर पड़ेगा।
अध्ययन में सबसे बड़ी चिंता सूखे मौसम को लेकर जताई गई है। अनुमान है कि इस दौरान हिमालयी नदियों का औसत बहाव करीब 80 फीसदी तक कम हो सकता है। इसका असर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे हिमालयी क्षेत्रों में संचालित जलविद्युत परियोजनाओं पर पड़ सकता है।
इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ऐसी परियोजनाएं हैं, जो नदियों के प्राकृतिक प्रवाह पर निर्भर करती हैं। ऐसे में नदी के प्रवाह में मौसमी बदलाव होने पर बिजली उत्पादन की मात्रा और समय दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
यह अध्ययन अरुणाचल प्रदेश की कामेंग हाइड्रो इलेक्ट्रिक परियोजना को आधार बनाकर किया गया है। इसमें भविष्य में नदी के जल प्रवाह और उससे होने वाले बिजली उत्पादन में संभावित बदलावों का आकलन किया गया है।
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन के बावजूद कुछ कम पानी और अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए डिजाइन की गई रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाएं सालाना बिजली उत्पादन के लिहाज से अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रह सकती हैं।
वर्ष 2100 तक इन परियोजनाओं के लिए करीब 0.42 क्षमता कारक बने रहने का अनुमान लगाया गया है। यानी सालाना बिजली उत्पादन पूरी तरह खत्म होने की स्थिति नहीं होगी, लेकिन साल के अलग-अलग मौसम में उत्पादन की मात्रा और समय में बड़ा बदलाव आ सकता है।
हिमाचल प्रदेश में बड़ी संख्या में रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाएं संचालित हैं। इनका उत्पादन सीधे तौर पर नदियों में उपलब्ध पानी पर निर्भर करता है। यदि मानसून के दौरान पानी की उपलब्धता बढ़ती है और सर्दियों तथा सूखे मौसम में इसमें भारी कमी आती है तो बिजली उत्पादन की मौजूदा योजना और परियोजनाओं के संचालन के तरीके में बदलाव करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक भविष्य की हाइड्रो परियोजनाओं की योजना केवल सालाना औसत जल उपलब्धता के आधार पर नहीं बनाई जा सकती। परियोजनाओं के डिजाइन और संचालन में तापमान, बारिश के बदलते पैटर्न और नदी के मौसमी प्रवाह को भी शामिल करना होगा।
मानसून में बारिश बढ़ने से जहां पानी की उपलब्धता बढ़ सकती है, वहीं इसके साथ बाढ़, भूस्खलन और अन्य चरम मौसमी घटनाओं का खतरा भी बढ़ सकता है। दूसरी ओर, सूखे मौसम में नदी का प्रवाह कम होने से बिजली उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है।
सूचना, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, हिमाचल प्रदेश के निदेशक पुष्पेंद्र राणा के अनुसार, यह अध्ययन हिमालयी राज्यों के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी है। बदलते मौसमी पैटर्न को देखते हुए भविष्य की जलविद्युत परियोजनाओं में जलवायु-लचीले डिजाइन, चरम मौसम की घटनाओं और नदी के बदलते प्रवाह को ध्यान में रखना जरूरी होगा।
यह अध्ययन सिद्धार्थ अरोड़ा, अनिल वी. कुलकर्णी और प्रोसेनजीत घोष ने किया है। अरोड़ा और कुलकर्णी भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलूरू के दिवेचा सेंटर ऑफ क्लाइमेट चेंज से जुड़े हैं, जबकि अध्ययन में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी, रुड़की भी संबद्ध है। शोध पत्रिका Sustainable Energy Technologies and Assessments के अगस्त अंक में यह अध्ययन प्रकाशित हुआ है।