
शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मुख्य संसदीय सचिव (CPS) के पद से हटाए जा चुके छह विधायकों के सरकारी आवास बिना आवेदन नियमित किए जाने के मामले में राज्य सरकार पर सख्त रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने 4 मई 2026 के सरकारी आदेश पर नाराजगी जताते हुए सरकार से जवाब तलब किया है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है मानो "मुझे चेहरा दिखाओ, मैं तुम्हें नियम दिखा दूंगा" की नीति पर काम किया जा रहा है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि इस मामले में नोटिस जारी नहीं किया जाता, तो सरकार पूरे मुद्दे को दबाए रखती।
हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को हलफनामा दायर कर तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जवाब देने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने पूछा है कि क्या इससे पहले किसी अन्य कर्मचारी या व्यक्ति को बिना आवेदन इस प्रकार की विशेष छूट दी गई है। साथ ही यह भी स्पष्ट करने को कहा गया है कि छह पूर्व CPS को बिना आवेदन सरकारी आवासों में रहने की अनुमति किस आधार पर दी गई। इसके अलावा इन आवासों पर कितना दंडात्मक किराया बनता है, इसकी पूरी जानकारी भी अदालत में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।
अदालत ने राज्य सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि पूर्व CPS को विशेष राहत देने वाले 4 मई 2026 के आदेश पर रोक क्यों न लगाई जाए। मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त को होगी।
गौरतलब है कि 8 जनवरी 2023 को कांग्रेस सरकार ने छह विधायकों को मुख्य संसदीय सचिव नियुक्त किया था। इनमें संजय अवस्थी, सुंदर सिंह ठाकुर, मोहन लाल ब्राक्टा, राम कुमार चौधरी, आशीष बुटेल और किशोरी लाल शामिल थे।
भाजपा ने इन नियुक्तियों को संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। 13 नवंबर 2024 को हाईकोर्ट ने सभी छह CPS की नियुक्तियों को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था और उनसे सभी सरकारी सुविधाएं वापस लेने के आदेश दिए थे। बाद में 22 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले के कुछ हिस्सों पर अंतरिम राहत दी, लेकिन मुख्य संसदीय सचिव का पद बहाल नहीं किया गया।