
शिमला। हिमाचल प्रदेश में औद्योगिक नीति की अवधि समाप्त होने के बाद उद्योग जगत की चिंता बढ़ गई है। 11 अक्तूबर को नीति की समय सीमा पूरी हो चुकी है, लेकिन नई औद्योगिक नीति अभी तक लागू नहीं हो पाई है। ऐसे में बिजली शुल्क, ट्रांसपोर्ट और ऋण के ब्याज पर मिलने वाली रियायतों को लेकर उद्योगपति असमंजस में हैं।
प्रदेश में करीब 30 हजार छोटे-बड़े उद्योग संचालित हो रहे हैं। इन उद्योगों के लिए सरकारी रियायतें उत्पादन लागत कम रखने और कारोबार को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती हैं। उद्योगपतियों को आशंका है कि नीति में देरी से उत्पादन लागत बढ़ सकती है और नए निवेश की योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
2019 में लागू हुई थी औद्योगिक नीति
हिमाचल सरकार ने निवेश को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 16 अगस्त 2019 को औद्योगिक नीति लागू की थी। इसकी मूल अवधि 31 दिसंबर 2025 को समाप्त हुई। इसके बाद मार्च 2026 में इसे विस्तार दिया गया और फिर 10 अगस्त से 11 अक्तूबर तक अवधि बढ़ाई गई। अब समय सीमा समाप्त होने के बाद उद्योग जगत नई नीति का इंतजार कर रहा है।
करीब 100 उद्योगपतियों ने घटाया उत्पादन
जानकारी के अनुसार, प्रदेश में करीब 100 उद्योगपतियों ने उत्पादन कम किया है। उद्योग क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि बिजली और परिवहन पर मिलने वाली रियायतें उत्पादन और माल ढुलाई की लागत कम रखने में मदद करती हैं। वहीं, ऋण पर मिलने वाले प्रोत्साहन से उद्योगों के विस्तार और नई इकाइयां स्थापित करने में सहायता मिलती है।
जल्द नई नीति लाएगी सरकार: हर्षवर्धन चौहान
उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने कहा कि औद्योगिक नीति की अवधि समाप्त हो गई है। सरकार जल्द नई औद्योगिक नीति लाने जा रही है। इस संबंध में विभागीय अधिकारियों के साथ बैठक की जाएगी।
पुरानी रियायतें जारी रखने की मांग
बीबीएनआईए के मुख्य सलाहकार शैलेष अग्रवाल ने कहा कि पुरानी नीति के तहत स्थानीय निवेश पर सीजीएसटी से संबंधित कैशबैक और बिजली शुल्क में छूट जैसी सुविधाएं मिलती थीं। नई नीति लागू नहीं होने से उद्योगपति असमंजस में हैं कि इन सुविधाओं का लाभ आगे भी मिलेगा या नहीं।
बीबीएन उद्योग संघ के पूर्व अध्यक्ष राजेंद्र गुलेरिया ने सरकार से जल्द नई नीति घोषित करने की मांग की। वहीं, बीबीएनआईए के महासचिव रजनीश विज ने कहा कि संघ ने सरकार को पत्र लिखकर मांग की है कि नई नीति लागू होने तक पुरानी नीति को मान्य रखा जाए।
बीबीएनआईए के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मुकेश जैन ने भी उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए 2003 की तर्ज पर प्रभावी औद्योगिक नीति बनाने की मांग उठाई है।
उद्योग जगत की मांग है कि सरकार जल्द नई नीति लागू करे या पुरानी नीति के तहत मिलने वाली सुविधाएं जारी रखने पर स्पष्ट निर्णय ले, ताकि निवेशकों का भरोसा बना रहे और प्रदेश में औद्योगिक गतिविधियों को गति मिल सके।