
नई दिल्ली/शिमला: भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) परियोजनाओं में हिमाचल प्रदेश के हिस्से को लेकर करीब छह दशक से चले आ रहे विवाद के समाधान की दिशा में अहम प्रगति हुई है। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने एक कैशलेस सेटलमेंट का प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत हिमाचल प्रदेश को उसके लंबे समय से लंबित बिजली बकाये का भुगतान नकद के बजाय बिजली (ऊर्जा) के रूप में किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान बताया गया कि हिमाचल प्रदेश और हरियाणा सरकारें इस प्रस्ताव से सिद्धांततः सहमत हैं, जबकि पंजाब सरकार ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई है। इस पर अदालत ने पंजाब सरकार को कड़ी टिप्पणी करते हुए दो सप्ताह के भीतर अपना स्पष्ट रुख बताने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 12 अगस्त को होगी।
जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2011 के फैसले के बाद हिमाचल प्रदेश को बीबीएमबी परियोजनाओं से 7.19 प्रतिशत बिजली हिस्सा मिलना शुरू हुआ था। हालांकि 1966 से 2011 तक की अवधि का बकाया अब तक नहीं मिला है। यह बकाया करीब 13,066 मिलियन यूनिट बिजली के बराबर है।
केंद्र सरकार के प्रस्ताव के अनुसार पंजाब और हरियाणा इस बकाये का भुगतान नकद के बजाय बिजली के रूप में करेंगे। प्रस्ताव में 13,066 मिलियन यूनिट में से 12,000 मिलियन यूनिट से अधिक बिजली हिमाचल प्रदेश को देने की व्यवस्था का सुझाव दिया गया है।
इस प्रस्ताव का एक और बड़ा लाभ हिमाचल प्रदेश को मिल सकता है। बीबीएमबी परियोजनाओं की पूंजीगत लागत के रूप में पंजाब और हरियाणा को दिए जाने वाले करीब 420 करोड़ रुपये भी बिजली बकाये में समायोजित कर दिए जाएंगे। इससे प्रदेश पर यह वित्तीय बोझ समाप्त हो जाएगा।
सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता निधेश गुप्ता ने प्रस्तावित 2.50 रुपये प्रति यूनिट की दर पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि इस दर पर भुगतान होने से पंजाब पर लगभग 2,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट टिप्पणी की कि हिमाचल प्रदेश के पास पंजाब और हरियाणा जैसी राजस्व संभावनाएं नहीं हैं। प्रदेश की भूमि पर नदियां और बांध स्थित हैं, इसलिए उसके अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी कहा कि यदि राज्यों के बीच सहमति नहीं बनती है तो वह मामले का गुण-दोष के आधार पर अंतिम फैसला सुनाएगी।