
शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में बंदरों के आतंक ने एक और परिवार को गहरा सदमा दिया है। समिट्री क्षेत्र में बंदरों के हमले के बाद बहुमंजिला मकान की छत से गिरकर गंभीर रूप से घायल हुई 63 वर्षीय सत्या देवी ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। महिला पिछले करीब एक सप्ताह से आईजीएमसी के आईसीयू में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही थीं।
जानकारी के अनुसार, 30 अगस्त की सुबह करीब 7:30 बजे सत्या देवी अपने मकान की छत पर रखी पानी की टंकियों को देखने गई थीं। इसी दौरान छत पर मौजूद बंदरों के झुंड ने उन पर हमला कर दिया। अचानक हुए हमले से वह अपना संतुलन नहीं संभाल पाईं और बहुमंजिला मकान की छत से नीचे आंगन में जा गिरीं।
पड़ोसियों ने महिला को छत से गिरते देखा और उनके शोर मचाने पर परिवार के सदस्य भी मौके पर पहुंचे। गंभीर हालत में सत्या देवी को उपचार के लिए आईजीएमसी अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया।
परिजनों के मुताबिक, छत से गिरने के कारण सत्या देवी के सीने में गंभीर चोटें आई थीं। अधिक खून बहने के चलते उन्हें सांस लेने में भी परेशानी हो रही थी। डॉक्टरों की निगरानी में करीब एक सप्ताह तक उनका इलाज चला, लेकिन आखिरकार उन्होंने दम तोड़ दिया।
शिमला शहर में बंदरों के हमले और काटने के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। हर महीने दर्जनों लोग बंदरों के हमले से घायल होकर आईजीएमसी और अन्य अस्पतालों में पहुंचते हैं। इससे पहले भी मिडल बाजार और कुफ्टाधार क्षेत्र में बंदरों के हमले से दो महिलाओं की मौत के मामले सामने आ चुके हैं।
शहर के जाखू, संजौली, लक्कड़ बाजार, छोटा शिमला, बैनमोर, शांति विहार, समरहिल और चौड़ा मैदान सहित कई क्षेत्रों में बंदरों का आतंक लोगों के लिए बड़ी परेशानी बना हुआ है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बंदरों को पकड़ने के साथ उनकी नसबंदी का अभियान भी प्रभावी तरीके से चलाया जाना चाहिए। लोगों का आरोप है कि लंबे समय से बंदरों की समस्या पर ठोस कार्रवाई नहीं होने के कारण हालात लगातार बिगड़ रहे हैं।
शिमला में बंदरों की बढ़ती संख्या के बीच अब उनकी नसबंदी का अभियान भी बंद बताया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, बंदरों की नसबंदी के लिए मिलने वाला सरकारी बजट बंद होने के बाद उन्हें पकड़ने का अभियान भी प्रभावित हुआ है।
स्थिति यह है कि बंदरों से संबंधित शिकायतों पर कार्रवाई को लेकर वन विभाग और नगर निगम के बीच जिम्मेदारी को लेकर असमंजस बना हुआ है। वन विभाग का कहना है कि बंदर अब लावारिस पशुओं की श्रेणी में शामिल हैं और उनका जिम्मा नगर निगम का है। वहीं नगर निगम की ओर से कहा जा रहा है कि बंदरों से संबंधित शिकायतें अभी वन विभाग ही देख रहा है और यह जिम्मेदारी नगर निगम को नहीं सौंपी गई है।
शिमला में बंदरों के हमले में सत्या देवी की मौत के बाद एक बार फिर शहर में बंदरों की समस्या को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते बंदरों की बढ़ती संख्या पर नियंत्रण और हमलों को रोकने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में ऐसी घटनाएं और बढ़ सकती हैं।
अब देखना होगा कि सत्या देवी की मौत के बाद प्रशासन, वन विभाग और नगर निगम बंदरों के आतंक से निपटने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं।