
हिमाचल प्रदेश: उत्तर प्रदेश की कई पेपर मिलों के बंद होने से हिमाचल के गत्ता उद्योग पर संकट और गहरा गया है। पेपर की सप्लाई प्रभावित होने के चलते प्रदेश की गत्ता फैक्ट्रियों को अब पेपर करीब 4 से 5 रुपये प्रति किलो महंगा मिल रहा है। पहले से मंदी की मार झेल रहे गत्ता उद्योग के लिए कच्चे माल की बढ़ती कीमतों ने मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
प्रदेश में करीब 300 गत्ता उद्योग संचालित हो रहे हैं, जिनसे लगभग 20 हजार युवाओं को प्रत्यक्ष रोजगार मिला है, जबकि इतने ही लोग अप्रत्यक्ष रूप से इस उद्योग से जुड़े हुए हैं। उद्योगपतियों का कहना है कि लगातार बढ़ती लागत के बावजूद ग्राहकों पर दोबारा कीमत बढ़ाने का दबाव बनाना आसान नहीं है।
गत्ता उद्योग से जुड़े कारोबारियों के अनुसार कुछ माह पहले खाड़ी क्षेत्र में बने हालात के बीच कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण गत्ते के डिब्बों के दाम 8 से 10 फीसदी तक बढ़ाए गए थे। सेब के कार्टन की कीमत पहले करीब 55 से 65 रुपये के बीच चल रही थी।
अब यूपी की पेपर मिलों से सप्लाई प्रभावित होने के बाद एक बार फिर कच्चे माल के दाम बढ़ने लगे हैं। ऐसे में उद्योगपतियों के लिए पुराने ऑर्डर भी मौजूदा कीमतों पर पूरा करना मुश्किल हो रहा है।
हिमाचल के गत्ता उद्योगों को पेपर की सप्लाई मुख्य रूप से हिमाचल, पंजाब और उत्तर प्रदेश से होती है। इसमें करीब 70 फीसदी पेपर उत्तर प्रदेश से आता है, जबकि हिमाचल और पंजाब की पेपर मिलों से लगभग 30 फीसदी आपूर्ति होती है।
पिछले करीब 15 दिनों से कांवड़ यात्रा के चलते मेरठ, शामली और मुजफ्फरनगर क्षेत्र की कई पेपर मिलों के बंद रहने से डिस्पैच प्रभावित हुआ है। इससे पेपर की उपलब्धता कम हुई और मांग बढ़ते ही पंजाब तथा हिमाचल की पेपर मिलों ने भी कीमतों में बढ़ोतरी कर दी।
गत्ता उद्योग पहले से ही सेब सीजन में प्लास्टिक क्रेट के बढ़ते इस्तेमाल से प्रभावित है। उद्योग से जुड़े लोगों के मुताबिक जहां पहले सेब सीजन में करीब चार करोड़ डिब्बों की खपत होती थी, वहीं इस साल यह संख्या घटकर करीब एक से डेढ़ करोड़ डिब्बों तक रहने की उम्मीद है।
ऐसे में कारोबार घटने के साथ-साथ पेपर महंगा होने से उद्योगपतियों के सामने कर्मचारियों का वेतन निकालना तक चुनौती बनता जा रहा है।
गत्ता उद्योग संघ के पूर्व अध्यक्ष मुकेश जैन ने कहा कि प्रदेश का गत्ता उद्योग लगातार मंदी की मार झेल रहा है। उन्होंने बताया कि डिब्बों पर 5 फीसदी GST, जबकि पेपर पर 18 फीसदी GST है। दोनों के बीच 13 फीसदी का अंतर उद्योग की कार्यशील पूंजी पर अतिरिक्त दबाव डालता है।
उन्होंने यह भी बताया कि गत्ते के डिब्बे खरीदने वाले उद्योगों से भुगतान अक्सर 60 से 90 दिन बाद मिलता है। ऐसे में यदि कोई उद्योग एक महीने में करीब एक करोड़ रुपये का कारोबार करता है तो उसे प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए बड़ी रकम कार्यशील पूंजी के तौर पर अपने पास रखनी पड़ती है।
उद्योगपतियों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि पेपर की कीमत लगातार बढ़ रही है, लेकिन वे हर बार डिब्बों के दाम बढ़ाकर इसका बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल सकते। दूसरी ओर पुराने रेट पर ऑर्डर पूरा करने से उत्पादन लागत और बिक्री मूल्य के बीच अंतर बढ़ता जा रहा है।
ऐसे में यदि उत्तर प्रदेश की पेपर मिलों से आपूर्ति जल्द सामान्य नहीं हुई और पेपर की कीमतों में कमी नहीं आई, तो हिमाचल के गत्ता उद्योग के साथ-साथ पैकिंग सामग्री का इस्तेमाल करने वाले अन्य कारोबारों पर भी इसका असर पड़ सकता है।