
हिमाचल प्रदेश को देश की 'पावर स्टेट' बनाने की महत्वाकांक्षा अभी अधूरी है। प्रदेश में लगभग 23,947.25 मेगावाट जलविद्युत उत्पादन की क्षमता होने के बावजूद अब तक केवल 12,588.63 मेगावाट क्षमता का ही उपयोग हो पाया है। यानी राज्य अपनी कुल संभावित क्षमता का सिर्फ 52.6 प्रतिशत ही दोहन कर सका है।
ऊर्जा विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 189 जलविद्युत परियोजनाएं संचालित हैं, जबकि 54 परियोजनाएं निर्माणाधीन या विभिन्न चरणों में हैं। वहीं 530 परियोजनाएं, जिनकी कुल क्षमता 7,623.61 मेगावाट है, अभी भी क्लीयरेंस, आवंटन और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में फंसी हुई हैं।
जलविद्युत विकास में निजी क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। निजी कंपनियों ने 40 परियोजनाओं के माध्यम से 2,890.51 मेगावाट क्षमता विकसित की है, जबकि 10 परियोजनाएं अभी निर्माणाधीन हैं।
वहीं, 5 मेगावाट तक की 110 छोटी परियोजनाएं चालू हैं, जिनकी कुल क्षमता 367.77 मेगावाट है। दूसरी ओर, केंद्रीय और संयुक्त उपक्रमों ने 13 परियोजनाओं के जरिए 8,311.73 मेगावाट क्षमता विकसित की है, जो प्रदेश की कुल स्थापित क्षमता का बड़ा हिस्सा है।
हिमाचल के सतलुज, चिनाब, ब्यास, रावी और यमुना नदी बेसिनों में विशाल जलविद्युत क्षमता मौजूद है। इनमें चिनाब और सतलुज बेसिन को सबसे अधिक संभावनाओं वाला क्षेत्र माना जाता है। किन्नौर, लाहौल-स्पीति, चंबा, कुल्लू और मंडी जिले जलविद्युत विकास के प्रमुख केंद्र हैं।
पर्यावरणीय और सामाजिक कारणों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने 11 जलविद्युत परियोजनाओं, जिनकी कुल क्षमता 815.40 मेगावाट थी, को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला लिया है।
ऊर्जा विभाग के निदेशक राकेश कुमार प्रजापति ने कहा कि हिमाचल के पास लगभग 24 हजार मेगावाट जलविद्युत क्षमता है, जो प्रदेश के आर्थिक विकास की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। सरकार पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय हितों का ध्यान रखते हुए लंबित परियोजनाओं को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही है।