
शिमला। हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते तापमान और बदलते मौसम का असर अब हिमाचल प्रदेश की दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों पर भी दिखाई देने लगा है। एक नए अध्ययन के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण हिमाचल में पाई जाने वाली अतीस, क्षीर काकोली और कुटकी जैसी महत्वपूर्ण औषधीय प्रजातियों का प्राकृतिक आवास भविष्य में 33 से 57 फीसदी तक कम हो सकता है।
जर्नल ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने वर्ष 2050 और 2070 के संभावित जलवायु परिदृश्यों के आधार पर इन औषधीय पौधों के भविष्य के आवास का आकलन किया। इसके लिए 24 पर्यावरणीय और भौगोलिक कारकों का विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में बारिश की मौसमी विषमता और दिन-रात के तापमान में अंतर को सबसे प्रभावशाली कारक पाया गया है। बारिश की मौसमी विषमता की भूमिका करीब 34 से 45 फीसदी तक आंकी गई है।
मानसून के समय में बदलाव, बर्फबारी में परिवर्तन और बर्फ के जल्दी पिघलने से मिट्टी की नमी का संतुलन प्रभावित हो रहा है। वहीं दिन और रात के तापमान में बढ़ता अंतर भी इन वनस्पतियों के प्राकृतिक आवास के लिए बड़ी चुनौती बन रहा है। इसकी भूमिका करीब 22 से 28 फीसदी बताई गई है।
अध्ययन में क्षीर काकोली को सबसे संवेदनशील प्रजाति पाया गया है। मौसम और तापमान में बदलाव के कारण इसके प्राकृतिक आवास में सबसे ज्यादा बिखराव और कमी आने की आशंका जताई गई है।
वहीं अतीस की जड़ों का इस्तेमाल पारंपरिक चिकित्सा में किया जाता है। कम उत्सर्जन वाले परिदृश्य में 2050 तक इसके आवास में कुछ अस्थायी वृद्धि संभव है, लेकिन अधिक उत्सर्जन की स्थिति में 2070 तक इसकी स्थिति कमजोर हो सकती है।
कुटकी का उपयोग यकृत संबंधी समस्याओं में किया जाता है। यह ऊंचाई वाले अल्पाइन क्षेत्रों में कुछ समय तक टिक सकती है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण इसके कुल उपयुक्त आवास में कमी आने की संभावना है।
शोधकर्ताओं के अनुसार इन औषधीय पौधों के लिए खतरा केवल जलवायु परिवर्तन तक सीमित नहीं है। अत्यधिक संग्रह, अवैज्ञानिक दोहन, धीमा प्राकृतिक पुनर्जनन और मानवीय हस्तक्षेप भी इनके अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौती हैं।
विशेष रूप से जड़ों और भूमिगत हिस्सों को निकालने से कई पौधों के दोबारा उगने की संभावना कम हो जाती है।
अध्ययन के मॉडल के अनुसार तापमान बढ़ने के साथ इन औषधीय पौधों के लिए अनुकूल क्षेत्र अधिक ऊंचाई वाले इलाकों की ओर खिसक सकते हैं। ऐसे में लाहौल-स्पीति, किन्नौर और कुल्लू के ऊंचाई वाले क्षेत्र भविष्य में इन प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण जलवायु शरणस्थल बन सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण के लिए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के साथ-साथ इनके अत्यधिक दोहन पर रोक और प्राकृतिक आवासों के संरक्षण की जरूरत पर जोर दिया है।