
उत्तराखंड में मानसून के दौरान प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। पिछले वर्ष धराली जैसी आपदाओं में भारी जान-माल का नुकसान हुआ, वहीं नेपाल में हालिया त्रासदी ने भी हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को लेकर चिंता बढ़ा दी है। प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे और इससे निपटने की तैयारियों को लेकर वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के निदेशक विनीत गहलोत ने महत्वपूर्ण जानकारी साझा की।
विनीत गहलोत के अनुसार हिमालय भूगर्भीय रूप से अपेक्षाकृत युवा क्षेत्र है, इसलिए यहां भूस्खलन, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता अधिक रहती है। जलवायु परिवर्तन का असर भी अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। आंकड़ों से संकेत मिल रहे हैं कि भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएं बढ़ी हैं।
उन्होंने बताया कि बारिश की कुल मात्रा में बहुत बड़ा बदलाव जरूरी नहीं हुआ है, लेकिन बारिश की तीव्रता, समय और वितरण में बदलाव आया है। अब कम समय में अत्यधिक बारिश होने की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे अचानक बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। तापमान में मामूली बदलाव भी बारिश और हिमपात की प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है।
जलवायु परिवर्तन का असर हिमालय की पारिस्थितिकी पर भी दिखाई दे रहा है। ट्री लाइन और स्नो लाइन में बदलाव हो रहा है। जिन क्षेत्रों में पहले बर्फबारी होती थी, वहां अब बारिश होने की घटनाएं सामने आ रही हैं।
राज्य में संभावित खतरा पैदा करने वाली पांच हिमनद झीलों पर विशेष निगरानी की जा रही है। इन झीलों से किस तरह की आपदा उत्पन्न हो सकती है और उसके पीछे ग्लेशियर, भूस्खलन, अत्यधिक बारिश या अन्य कौन-से कारण हो सकते हैं, इसका आकलन किया जा रहा है।
वाडिया संस्थान के निदेशक के मुताबिक इसके लिए मल्टी-लेयर्ड अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करना जरूरी है। केवल झील के पास ही नहीं, बल्कि उसके नीचे आने वाले पूरे प्रवाह क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर निगरानी उपकरण लगाए जाने चाहिए। इससे किसी एक स्थान पर नेटवर्क फेल होने, भारी बर्फबारी, बिजली गिरने या ग्लेशियर गिरने जैसी स्थिति में दूसरे सेंसर से सूचना मिल सकेगी।
इस साल वसुंधरा झील पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की योजना भी बताई गई है। साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों में लोगों की बसावट को नियंत्रित करने और जरूरत पड़ने पर प्रभावित आबादी के पुनर्वास पर भी जोर दिया गया है।
उत्तराखंड भूकंप की दृष्टि से भी बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। विशेषज्ञ के अनुसार करीब 600 वर्षों से कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है, ऐसे में विशेष रूप से कुमाऊं क्षेत्र की संवेदनशीलता को लेकर चिंता बनी हुई है।
राज्य में भूकंप की पूर्व चेतावनी के लिए आईआईटी रुड़की की ओर से करीब 250 अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए गए हैं और इसके लिए 'भूदेव' एप भी विकसित किया गया है। हालांकि भूकंप की सटीक भविष्यवाणी संभव नहीं है, लेकिन अर्ली वार्निंग और जनजागरूकता के जरिए इसके प्रभाव को कम करने पर जोर दिया जा रहा है।
विनीत गहलोत ने कहा कि हिमालय से जुड़ी चुनौतियां इतनी व्यापक हैं कि कोई एक संस्थान अकेले उनका समाधान नहीं कर सकता। अलग-अलग संस्थानों को अपनी विशेषज्ञता के अनुसार मिलकर काम करना होगा।
हिमनद झील विस्फोट के जोखिम को लेकर वाडिया, एनआईएच और सीबीआरआई जैसे संस्थान अपनी-अपनी विशेषज्ञता के आधार पर समन्वय से काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि हिमालयी आपदाओं से निपटने के लिए वैज्ञानिक संस्थानों, प्रशासन और स्थानीय लोगों के बीच बेहतर तालमेल और जागरूकता बेहद जरूरी है।
प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक निगरानी, समय पर चेतावनी, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और लोगों की जागरूकता के जरिए जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।