
नई दिल्ली: उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान हुए चर्चित अंकित शर्मा हत्याकांड में कड़कड़डूमा कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत पांच दोषियों को आजीवन कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने अपने 39 पन्नों के फैसले में अभियोजन की मौत की सजा की मांग को खारिज करते हुए कहा कि अपराध बेहद क्रूर और समाज को झकझोर देने वाला है, लेकिन यह मामला "दुर्लभ से दुर्लभतम" श्रेणी में नहीं आता।
अदालत ने कहा कि पीड़ित अंकित शर्मा को केवल धर्म के आधार पर हिंसक भीड़ ने निशाना बनाया, उन पर हमला किया, शव को बांधकर घसीटा और नाले में फेंक दिया। हालांकि न्यायालय ने माना कि किसी भी दोषी की हत्या में प्रत्यक्ष और विशिष्ट भूमिका संदेह से परे साबित नहीं हुई। सभी दोषियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 149 (सामूहिक आपराधिक दायित्व) के तहत दोषी ठहराया गया।
मामले में ताहिर हुसैन, नाजिम, कासिम, जावेद और अनस को हत्या, अपहरण, दंगा और सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने सहित विभिन्न धाराओं में दोषी करार दिया गया। धारा 302/149 के तहत सभी को आजीवन कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। ताहिर हुसैन पर 5 लाख रुपये, जबकि अन्य चार दोषियों पर 25-25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।
अभियोजन पक्ष ने अदालत में दलील दी थी कि फरवरी 2020 के दंगों के दौरान हिंसक भीड़ ने अंकित शर्मा को घेरकर बेरहमी से हमला किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उनके शरीर पर 51 गंभीर चोटों का उल्लेख किया गया था। अभियोजन ने इसे पूर्व नियोजित और अत्यंत बर्बर हत्या बताते हुए दोषियों के लिए फांसी की सजा की मांग की थी।
वहीं बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि किसी भी आरोपी की प्रत्यक्ष भूमिका सिद्ध नहीं हुई है और सभी के सुधार की संभावना मौजूद है। अदालत ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि केवल अपराध की क्रूरता ही मौत की सजा का आधार नहीं बन सकती। अपराधियों की परिस्थितियों और सुधार की संभावना पर भी विचार करना आवश्यक है।
अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि दंगों के दौरान फैली अफवाहों और धार्मिक उन्माद ने हिंसा को बढ़ावा दिया, लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि दोषी भविष्य में समाज के लिए स्थायी खतरा बने रहेंगे। इसी आधार पर अदालत ने मौत की सजा के बजाय आजीवन कारावास को उचित माना।