
बिलासपुर: हिमाचल प्रदेश के एम्स बिलासपुर में आयुष्मान भारत और हिमकेयर योजना के तहत भुगतान लंबित होने से जटिल ऑर्थोपेडिक मरीजों के इलाज पर असर पड़ने लगा है। अस्पताल में सामान्य हड्डी संबंधी ऑपरेशन फिलहाल नियमित रूप से किए जा रहे हैं, लेकिन रिवीजन (दोबारा) और जटिल सर्जरियों के लिए जरूरी महंगे इम्प्लांट और विशेष उपकरण समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, दोनों स्वास्थ्य योजनाओं के तहत वेंडरों का करोड़ों रुपये का भुगतान लंबित है। एम्स प्रशासन लगातार प्रदेश सरकार से बकाया राशि जारी करने के लिए पत्राचार कर रहा है, लेकिन अब तक स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है। जो राशि जारी भी होती है, वह जरूरत के मुकाबले बेहद कम बताई जा रही है।
सूत्रों के मुताबिक, समय पर भुगतान न मिलने के कारण कई वेंडर महंगे इम्प्लांट, विशेष उपकरण और हाई-एंड मेडिकल सामग्री की आपूर्ति करने से पीछे हट रहे हैं। हालांकि सामान्य फ्रैक्चर, प्लेट-रॉड लगाने और नियमित घुटना या कूल्हा प्रत्यारोपण जैसी सर्जरियों के लिए आवश्यक सामग्री फिलहाल उपलब्ध है।
सबसे ज्यादा परेशानी उन मरीजों के सामने आ रही है, जिनकी पहले किसी बड़े अस्पताल में सर्जरी हो चुकी है और अब संक्रमण, इम्प्लांट ढीला होने, टूटने या अन्य जटिलताओं के कारण दोबारा ऑपरेशन की आवश्यकता है। ऐसे मामलों में मरीज की जरूरत के अनुसार विशेष डिजाइन वाले इम्प्लांट और हाई-एंड उपकरणों की आवश्यकता होती है, जिनकी कीमत कई लाख रुपये तक हो सकती है।
यदि महंगे इम्प्लांट और उपकरण समय पर उपलब्ध नहीं हुए तो जटिल सर्जरी कराने वाले मरीजों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ सकता है। जरूरत पड़ने पर ऐसे मरीजों को दूसरे चिकित्सा संस्थानों में भी रेफर करना पड़ सकता है।
एम्स बिलासपुर में रोबोटिक तकनीक से घुटना प्रत्यारोपण (नी-रिप्लेसमेंट) की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन यह सुविधा आयुष्मान भारत और हिमकेयर योजना के तहत कवर नहीं है। ऐसे में मरीजों को इसका पूरा खर्च स्वयं उठाना पड़ता है। एम्स में एक घुटने की रोबोटिक सर्जरी पर करीब एक लाख रुपये का खर्च आता है, जबकि निजी अस्पतालों में यही खर्च करीब दो लाख रुपये प्रति घुटना तक पहुंच जाता है।