
नई दिल्ली: दिल्ली सरकार की ऑनलाइन टेंडर व्यवस्था को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ऑडिट रिपोर्ट में गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। विधानसभा में पेश रिपोर्ट के मुताबिक, ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल के डिजिटल रिकॉर्ड की जांच में 3,217.44 करोड़ रुपये के 7,181 टेंडरों में बोली लगाने वाले ठेकेदारों और उनकी बोलियों की जांच व मंजूरी करने वाले सरकारी अधिकारियों का एक ही इंटरनेट प्रोटोकॉल (IP) पता पाया गया।
CAG ने इसे गंभीर अनियमितता मानते हुए मामले की विजिलेंस जांच की सिफारिश की है। सामान्य तौर पर ठेकेदार और सरकारी अधिकारी अलग-अलग नेटवर्क से टेंडर प्रक्रिया में शामिल होते हैं। ऐसे में एक ही IP पते का इस्तेमाल कई सवाल खड़े करता है।
ऑडिट में सामने आया कि 2,114.87 करोड़ रुपये के 2,519 टेंडरों में कुल 8,654 बोलियां उसी IP पते से अपलोड की गईं, जिसका इस्तेमाल संबंधित सरकारी अधिकारी कर रहे थे।
CAG के अनुसार, इससे यह आशंका पैदा होती है कि या तो ठेकेदारों ने सरकारी नेटवर्क से बोलियां दाखिल कीं या फिर अधिकारियों के सिस्टम का इस्तेमाल किया गया। हालांकि, इस संबंध में वास्तविक स्थिति जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल के रिकॉर्ड में भी कई विसंगतियां सामने आईं। ऑडिट के मुताबिक 12,283 ठेकेदारों का पंजीकरण महज 5,658 ईमेल आईडी से हुआ।
वहीं 2.52 करोड़ रुपये के 38 टेंडरों में सभी बोलीदाता एक ही ईमेल आईडी से पंजीकृत पाए गए। CAG ने इसे संभावित फर्जी प्रतिस्पर्धा या कवर बिडिंग की आशंका से जोड़ते हुए गंभीरता से लिया है।
इसी तरह 16,582 ठेकेदार केवल 6,957 मोबाइल नंबरों से पंजीकृत पाए गए। 4.99 करोड़ रुपये के 411 टेंडरों में शामिल सभी बोलीदाता एक ही मोबाइल नंबर से जुड़े मिले।
ऑडिट में 66 ठेकेदार बिना अनिवार्य PAN नंबर के पंजीकृत पाए गए। इनमें से 12 ठेकेदारों को टेंडर भी मिले। इसके अलावा 146 ठेकेदारों के PAN नंबर आयकर विभाग के रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते पाए गए।
CAG की रिपोर्ट में एक और गंभीर खामी सामने आई। सात सेवानिवृत्त अधिकारी रिटायरमेंट के बाद भी ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल पर सक्रिय पाए गए। उन्होंने तकनीकी और वित्तीय बोलियां खोलने के साथ-साथ उनके मूल्यांकन में भी हिस्सा लिया।
CAG ने इसे पोर्टल के एक्सेस कंट्रोल सिस्टम की गंभीर कमी माना है।
वर्ष 2017 से 2023 के बीच ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल पर कुल 1,54,586 टेंडर प्रकाशित हुए। इनकी अनुमानित लागत करीब 1,01,098.67 करोड़ रुपये थी।
लेकिन इनमें केवल 5,363 टेंडरों यानी 3.47 प्रतिशत में ही ठेका पाने वाले का अंतिम विवरण दर्ज था। वहीं वित्तीय मूल्यांकन का रिकॉर्ड भी केवल करीब 34 प्रतिशत टेंडरों में उपलब्ध मिला।
इससे पूरी टेंडर प्रक्रिया के पारदर्शी और पूर्ण डिजिटल रिकॉर्ड को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।
ऑडिट में यह भी सामने आया कि 1 जनवरी 2019 से टेंडर फीस समाप्त करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद 188 निविदा अधिकारियों ने करीब 3,408.03 करोड़ रुपये मूल्य के टेंडरों की 1,63,411 बोलियों से शुल्क वसूला।
7,181 टेंडरों में ठेकेदारों और अधिकारियों का एक ही IP पता
₹3,217.44 करोड़ के टेंडर जांच के घेरे में
2,519 टेंडरों में 8,654 बोलियां अधिकारियों वाले IP से अपलोड
7 सेवानिवृत्त अधिकारी पोर्टल पर सक्रिय मिले
12,283 ठेकेदार, लेकिन केवल 5,658 ईमेल आईडी
16,582 ठेकेदार, लेकिन केवल 6,957 मोबाइल नंबर
66 ठेकेदार बिना PAN के पंजीकृत
₹1.01 लाख करोड़ के टेंडरों में केवल 3.47% का अंतिम रिकॉर्ड उपलब्ध
CAG ने इन अनियमितताओं को गंभीरता से लेते हुए विजिलेंस जांच की सिफारिश की है। अब इस रिपोर्ट के बाद यह देखना अहम होगा कि संबंधित एजेंसियां इन रिकॉर्ड विसंगतियों की जांच किस स्तर तक ले जाती हैं और जिम्मेदारी तय होने पर क्या कार्रवाई की जाती है।