
नई दिल्ली: दिल्ली में वायु प्रदूषण की निगरानी के लिए 59 केंद्रों का नेटवर्क मौजूद है, लेकिन इसके बावजूद राजधानी के हर इलाके की हवा की वास्तविक स्थिति का सटीक आकलन करना चुनौती बना हुआ है। विशेषज्ञों के मुताबिक, निगरानी केंद्रों की लोकेशन, आसपास की भौगोलिक परिस्थितियां और प्रदूषण के अलग-अलग स्रोत इसकी प्रमुख वजह हैं।
दिल्ली में मंदिर मार्ग, अरविंदो मार्ग, लोधी रोड, सीरी फोर्ट और पूसा जैसे निगरानी केंद्र हरित क्षेत्रों के आसपास स्थित हैं। वहीं, वजीरपुर, बवाना, जहांगीरपुरी, नरेला, ओखला और पटपड़गंज जैसे इलाकों में औद्योगिक गतिविधियां प्रदूषण को प्रभावित करती हैं। चांदनी चौक जैसे व्यस्त बाजारों और आनंद विहार व आईटीओ जैसे यातायात वाले क्षेत्रों में प्रदूषण की स्थिति अलग हो सकती है।
आईआईटी दिल्ली के 2023 के एक अध्ययन में आबादी, भूमि उपयोग और प्रदूषण उत्सर्जन के आधार पर पीएम2.5 निगरानी केंद्रों का आकलन किया गया। इसमें सामने आया कि सभी केंद्रों की क्षेत्रीय पहुंच और अलग-अलग इलाकों की हवा का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता समान नहीं है।
आईआईटी दिल्ली के सिविल एवं पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर मुकेश खरे के अनुसार, घनी शहरी बसावट में एक निगरानी केंद्र लगभग दो से तीन किलोमीटर के क्षेत्र की हवा को समझने में मदद कर सकता है, जबकि खुले मैदानी इलाकों में यह दायरा पांच किलोमीटर तक हो सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इस पूरे क्षेत्र में प्रदूषण का स्तर एक जैसा रहता है।
राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम (NAMP) के तहत आवासीय, औद्योगिक, व्यावसायिक और संवेदनशील क्षेत्रों में प्रदूषण की निगरानी की जाती है। ये केंद्र वायु गुणवत्ता से जुड़े आंकड़े उपलब्ध कराते हैं, लेकिन किसी स्टेशन का एक्यूआई यह नहीं बताता कि कोई व्यक्ति वास्तव में कितनी प्रदूषित हवा के संपर्क में आया।
पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. गुफरान बेग के मुताबिक, वास्तविक प्रदूषण एक्सपोजर का आकलन करने के लिए यह जानना जरूरी है कि व्यक्ति किस स्थान पर और कितनी देर तक रहा।
आईआईटी दिल्ली के फरवरी 2026 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, मार्च 2021 में किए गए ड्रोन आधारित मापन के दौरान जमीन से 100 मीटर की ऊंचाई पर पीएम2.5 का स्तर सतह की तुलना में करीब 60 प्रतिशत अधिक दर्ज किया गया था। इससे संकेत मिलता है कि प्रदूषण को समझने के लिए केवल जमीन के पास किए गए मापन पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं हो सकता।
वायु गुणवत्ता के आंकड़ों की तुलना करते समय अलग-अलग मानकों को समझना भी जरूरी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के आकलन में अंतर दिखाई दे सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय एक्यूआई और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दिशानिर्देशों का उद्देश्य तथा गणना का आधार अलग है। इसलिए प्रदूषण के आंकड़ों को समझते समय केवल एक्यूआई ही नहीं, बल्कि पीएम2.5 की सांद्रता, निगरानी केंद्र की स्थिति और स्थानीय परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।