
शिमला। बेहतर रोजगार और शिक्षा की तलाश में हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी गांवों से लोग दूसरे क्षेत्रों की ओर जा रहे हैं, लेकिन अपने गांव और परिवार से उनका जुड़ाव बरकरार है। राज्य के नौ जिलों के नौ गांवों में किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि सर्वेक्षण में शामिल लोगों का पलायन मुख्य रूप से अस्थायी प्रकृति का था। बाहर रहने के बावजूद वे नियमित रूप से गांव लौटते रहे और परिवारों की आर्थिक जिम्मेदारी भी निभाते रहे।
यह शोध हाल ही में Frontiers in Human Dynamics शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में मंडी, चंबा, सिरमौर, सोलन, कांगड़ा, कुल्लू, शिमला, किन्नौर और लाहौल-स्पीति जिलों के एक-एक गांव को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने इन नौ गांवों के 486 परिवारों के कुल 1,894 लोगों से जुटाई गई जानकारी का विश्लेषण किया।
अध्ययन में 440 लोगों के जवाबों के अनुसार, 40.68 प्रतिशत लोगों ने रोजगार के अवसरों की कमी, जबकि 38.64 प्रतिशत ने शिक्षा को गांव छोड़ने का प्रमुख कारण बताया। शोध में शिक्षा के स्तर और पलायन के बीच भी संबंध सामने आया। अध्ययन के अनुसार, उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में पलायन की संभावना कम पढ़े-लिखे लोगों की तुलना में 9.96 गुना दर्ज की गई।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, बेहतर रोजगार और उच्च शिक्षा की तलाश लोगों को गांवों से बाहर जाने के लिए प्रेरित करती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उपलब्धता मजबूत करने की जरूरत भी सामने आती है।
अध्ययन में शामिल 440 लोगों में से 74.55 प्रतिशत हर तीन से छह महीने में अपने गांव लौटते थे, जबकि 95 प्रतिशत लोग एक साल के भीतर गांव आए। सर्वेक्षण में शामिल नौ गांवों में स्थायी पलायन का मामला दर्ज नहीं हुआ। हालांकि, ये निष्कर्ष अध्ययन में शामिल गांवों तक ही सीमित हैं और इन्हें पूरे हिमाचल प्रदेश की स्थिति का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता।
अध्ययन के अनुसार, 68.42 प्रतिशत लोग हिमाचल प्रदेश के भीतर ही दूसरी जगहों पर गए, जबकि 26.81 प्रतिशत राज्य से बाहर और 4.77 प्रतिशत विदेश गए। इनमें से 69.30 प्रतिशत लोग पर्वतीय क्षेत्रों और 30.70 प्रतिशत मैदानी या तराई क्षेत्रों की ओर गए।
पलायन के आर्थिक प्रभाव को लेकर अध्ययन में पाया गया कि 36.59 प्रतिशत लोग अपने परिवारों को पैसे भेजते थे। शोध में एक गांव में औसतन हर महीने 1.41 लाख रुपये पहुंचने का अनुमान लगाया गया। बाहर रहने वाले लोगों की ओर से भेजी गई औसत राशि 7,880 रुपये प्रतिमाह दर्ज की गई।
भेजी गई रकम में से 36.65 प्रतिशत घरेलू खर्च, 24.22 प्रतिशत कृषि और 22.98 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च हो रही थी। इसके अलावा 10.57 प्रतिशत राशि बचत और मकान संबंधी जरूरतों, 4.34 प्रतिशत स्वास्थ्य और 1.24 प्रतिशत कर्ज चुकाने पर खर्च की गई।
समाजशास्त्री डॉ. मोहन झारटा के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में आजीविका के लिए कई वैकल्पिक साधन उपलब्ध हैं। निचले क्षेत्रों में कृषि और ऊपरी इलाकों में बागवानी लोगों की आजीविका का आधार बन सकती है। उनके विचार में हिमाचल में पलायन अधिकतर अस्थायी प्रकृति का है और लोग बाहर रहने के बावजूद अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं।
अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि रोजगार और शिक्षा की तलाश में गांवों से बाहर जाना लोगों की जरूरत बन सकता है, लेकिन परिवारों से संबंध और गांवों में वापसी का सिलसिला कायम रह सकता है। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर अवसर उपलब्ध कराना पलायन के स्वरूप को प्रभावित कर सकता है।