
शिमला। हिमाचल प्रदेश में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों से निपटने के लिए अब प्राकृतिक कवक यानी फंगस मददगार साबित हो सकते हैं। उत्तर-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में ऐसे कई कवकों की पहचान की गई है, जो कीटों को संक्रमित कर उन्हें मारने की क्षमता रखते हैं। इससे भविष्य में रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण के अनुकूल खेती को बढ़ावा देने की उम्मीद जगी है।
इस दिशा में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर) के क्षेत्रीय केंद्र शिमला के शोधकर्ता अध्ययन कर रहे हैं। शोधकर्ता दिनेश कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संतोष वाटपाड़े और सहायक प्राध्यापक डॉ. नीलम कुमारी के निर्देशन में इस विषय पर काम कर रहे हैं।
शोध में क्लोनोस्टैकिस फंगस को सेब के पौधों को नुकसान पहुंचाने वाले वूली एफिड कीट के नियंत्रण में कारगर पाया गया है। प्रयोगशाला में इसके सफल परीक्षण के बाद अब सेब के बगीचों में इसकी प्रभावशीलता जांची जा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि खेतों में भी इसके अच्छे परिणाम सामने आते हैं, तो यह सेब उत्पादकों के लिए कीट नियंत्रण का एक उपयोगी विकल्प बन सकता है।
अध्ययन के दौरान आठ प्रमुख वंशों के कीट रोगजनक कवकों की पहचान की गई है। इनमें एकेंथोमाइसेस, ब्यूवेरिया, क्लोनोस्टैकिस, कॉर्डिसेप्स, लेकेनिसिलियम, लियांगिया, पर्पुरियोसिलियम और सैमसोनिएला शामिल हैं। इनकी पहचान के लिए बाहरी संरचना के साथ-साथ आणविक और आनुवंशिक विशेषताओं का विश्लेषण किया गया।
ये कवक प्राकृतिक रूप से संक्रमित कीटों, मिट्टी और पौधों से जुड़े आवासों में पाए जाते हैं। वैज्ञानिक इनकी कीटों को संक्रमित करने की क्षमता और अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियों में इनके प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं।
शोध से भविष्य में जैविक कीटनाशक विकसित करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। प्राकृतिक कवकों के उपयोग से फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का नियंत्रण करने और रासायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल को कम करने में मदद मिल सकती है। इससे पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि को भी बढ़ावा मिल सकता है।
हालांकि, वैज्ञानिकों के अनुसार, खेतों में बड़े स्तर पर इस्तेमाल से पहले इन कवकों की प्रभावशीलता, सुरक्षा और व्यावहारिक परिणामों का परीक्षण जरूरी है।
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संतोष वाटपाड़े के अनुसार, क्लोनोस्टैकिस कवक प्रयोगशाला में वूली एफिड के नियंत्रण में प्रभावी पाया गया है और अब इसका सेब के बगीचों में परीक्षण किया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि कई अन्य कवकों से उपयोगी औषधियां तैयार करने की संभावनाएं हैं।
यदि खेतों में चल रहे परीक्षण सफल रहते हैं, तो हिमाचल के सेब उत्पादकों को भविष्य में कीट प्रबंधन के लिए एक प्राकृतिक विकल्प मिल सकता है। इससे बागवानी में रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता घटाने की दिशा में महत्वपूर्ण मदद मिलने की उम्मीद है।