
शिमला। हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्रदेश हाईकोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारी (भर्ती और सेवा शर्तें) अधिनियम को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया गया था। राज्य सरकार की ओर से दाखिल याचिका पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ सुनवाई करेगी।
हाईकोर्ट ने इस कानून को रद्द करते हुए कहा था कि राज्य विधानसभा के पास अदालतों के फैसलों को पलटने या उन्हें निष्प्रभावी करने का अधिकार नहीं है। अदालत ने इस अधिनियम के आधार पर कर्मचारियों को दिए गए लाभ वापस लेने, वरिष्ठता खत्म करने और रिकवरी करने से जुड़े सभी सरकारी आदेशों व अस्वीकृति पत्रों को भी रद्द कर दिया था।
हाईकोर्ट ने सक्षम अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि न्यायिक फैसलों और संवैधानिक प्रावधानों के तहत पात्र कर्मचारियों को तीन महीने के भीतर सभी सेवा लाभ उपलब्ध करवाए जाएं।
25 अप्रैल 2026 को दिए गए अपने फैसले में अदालत ने कहा था कि राज्य सरकार ने 12 दिसंबर 2003 से पहले नियुक्त अनुबंध कर्मचारियों को न्यायिक आदेशों के आधार पर लाभ दिए, जबकि इसके बाद आर एंड पी नियमों के तहत पारदर्शी प्रक्रिया से चयनित कर्मचारियों को लाभों से वंचित करने का प्रयास किया गया। अदालत ने इसे अनुच्छेद-14 का उल्लंघन और मनमाना रवैया बताया था।
वहीं, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक अन्य मामले में भी महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु हो जाती है तो उसके परिवार को अनुकंपा नियुक्ति के अधिकार की जानकारी देना विभाग की जिम्मेदारी है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि विभाग ने परिवार को इस अधिकार की जानकारी नहीं दी है तो बाद में देरी का हवाला देकर आश्रित को नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल की अदालत ने याचिकाकर्ता नवीन कुमार की याचिका स्वीकार करते हुए भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन खारिज किया गया था।
मामले के अनुसार, नवीन कुमार के पिता अमर सिंह बीबीएमबी में बेलदार के पद पर कार्यरत थे और वर्ष 2001 में उनका निधन हो गया था। उस समय नवीन कुमार केवल 13 वर्ष के नाबालिग थे।
याचिकाकर्ता का कहना था कि विभाग ने न तो उसे और न ही परिवार के अन्य सदस्यों को अनुकंपा नियुक्ति के अधिकार की जानकारी दी। बाद में आवेदन करने पर विभाग ने देरी का हवाला देते हुए इसे खारिज कर दिया।
विभाग ने तर्क दिया था कि नियमों के अनुसार मृत्यु के दो साल के भीतर आवेदन करना जरूरी था और याचिकाकर्ता ने करीब 22 साल बाद आवेदन किया।
अदालत ने कहा कि जब याचिकाकर्ता पिता की मृत्यु के समय नाबालिग था और विभाग ने उसे अधिकार की जानकारी ही नहीं दी, तो देरी के आधार पर उसका दावा खारिज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि बीबीएमबी ने एक अन्य मामले में पिता की मृत्यु के 27 साल बाद भी नियमों में छूट देकर अनुकंपा नियुक्ति दी थी। अदालत ने कहा कि समान परिस्थितियों में सभी के साथ समान व्यवहार होना चाहिए।