
शिमला। बच्चों के लिए एक अच्छा दोस्त सिर्फ खेलने का साथी नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त में उनकी सबसे बड़ी ढाल भी बन सकता है। हिमाचल प्रदेश के किशोरों पर किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि माता-पिता के साथ मजबूत भावनात्मक जुड़ाव और सहयोगी मित्र समूह बच्चों को बुलिंग से बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। स्टडी के मुताबिक, जिन बच्चों को परिवार का भरोसा और अच्छे दोस्तों का साथ मिलता है, उनके बुलिंग का शिकार बनने या दूसरों को बुली करने की संभावना अपेक्षाकृत कम रहती है।
यह अध्ययन ममता हेल्थ इंस्टीट्यूट फॉर मदर एंड चाइल्ड, नई दिल्ली के शोधकर्ताओं ने किया है। शोध दल में दीपिका बहल, देविका मेहरा, निकिता पटेल, सरोज मोहंती, सुभा शंकर दास, ऋषि गर्ग, गौरव सेठी, अंजलि चौहान, सुनील मेहरा शामिल रहे।
यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका PLOS ONE में 2 अप्रैल 2026 को प्रकाशित हुआ। शोध के लिए नवंबर-दिसंबर 2023 के दौरान हिमाचल प्रदेश के सभी जिलों के 204 सरकारी स्कूलों में 13 से 17 वर्ष आयु वर्ग के 7563 विद्यार्थियों से मानकीकृत प्रश्नावली के माध्यम से जानकारी जुटाई गई।
अध्ययन में 15.6 प्रतिशत विद्यार्थी बुलिंग का शिकार पाए गए, जबकि 18.41 प्रतिशत किशोर शारीरिक या साइबर बुलिंग जैसी घटनाओं में किसी न किसी रूप में शामिल मिले। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन बच्चों का अपने माता-पिता के साथ बेहतर संवाद और भावनात्मक जुड़ाव था, उनमें बुलिंग का खतरा अपेक्षाकृत कम था।
अध्ययन में सामने आया कि लड़के न केवल बुलिंग का अधिक शिकार बन रहे हैं, बल्कि बुलिंग करने वालों में भी उनकी संख्या अधिक है। लड़कों में लड़कियों की तुलना में शारीरिक बुलिंग का शिकार बनने की संभावना 1.91 गुना और साइबर बुलिंग का शिकार बनने की संभावना 1.41 गुना अधिक पाई गई।
वहीं, लड़कों में शारीरिक बुलिंग करने की संभावना 1.57 गुना और साइबर बुलिंग करने की संभावना 1.63 गुना अधिक दर्ज की गई। शोध में यह भी सामने आया कि शहरी क्षेत्रों में रहने वाले किशोरों में ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में बुलिंग का जोखिम अधिक पाया गया।
शोधकर्ताओं ने बच्चों को बुलिंग से बचाने के लिए माता-पिता और बच्चों के बीच नियमित संवाद बढ़ाने की सिफारिश की है। इसके साथ ही स्कूलों में प्रभावी एंटी-बुलिंग नीति लागू करने, मानसिक स्वास्थ्य और काउंसलिंग सेवाओं को मजबूत करने तथा आयुष्मान भारत स्कूल हेल्थ एंड वेलनेस कार्यक्रम को सशक्त बनाने पर जोर दिया गया है।
शोधकर्ताओं ने बच्चों के अत्यधिक स्क्रीन टाइम, जंक फूड और अन्य अस्वस्थ आदतों को कम करने की दिशा में भी ध्यान देने की जरूरत बताई है।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अंकुर धर्माणी के अनुसार, बुलिंग का शिकार बच्चे अक्सर सिरदर्द, पेट दर्द, नींद की कमी, भूख कम लगने और बार-बार बीमार पड़ने जैसी समस्याओं के साथ अस्पताल पहुंचते हैं। कई बार मेडिकल जांच सामान्य आती है, लेकिन इन समस्याओं के पीछे मानसिक तनाव प्रमुख कारण हो सकता है।
वहीं, मनोवैज्ञानिक डॉ. दीपा राठौर ने कहा कि बच्चों के बीच खेल-खेल में किया गया मजाक भी कई बार बुलिंग का रूप ले सकता है, इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। माता-पिता और शिक्षकों को बच्चों के लिए ऐसा सुरक्षित माहौल तैयार करना चाहिए, जहां वे बिना किसी डर के अपनी बात साझा कर सकें। स्वस्थ दोस्ती वही है, जिसमें सहानुभूति, सम्मान और एक-दूसरे की सीमाओं का ध्यान रखा जाए।