
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दिव्यांगों के अधिकारों की रक्षा करते हुए अहम फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति जिया लाल भारद्वाज की एकल पीठ ने कहा कि दिव्यांग श्रेणी एक क्षैतिज आरक्षण है और इसके भीतर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य किसी वर्ग के आधार पर उप-आरक्षण देना संविधान और कानून के अनुरूप नहीं है।
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि दिव्यांग व्यक्ति की पहचान उसकी दिव्यांगता से होती है, न कि उसकी जाति या वर्ग से। इसलिए दिव्यांग कोटे के पदों में अनुसूचित जाति का अलग उप-कोटा लागू करना अवैध और असंवैधानिक है।
यह फैसला वर्ष 2008 की शारीरिक शिक्षा शिक्षक (पीईटी) भर्ती से जुड़े मामले में आया है। याचिकाकर्ता होशियार सिंह ने भर्ती प्रक्रिया में सबसे अधिक अंक हासिल किए थे, लेकिन उन्हें इस आधार पर चयनित नहीं किया गया कि संबंधित पद अनुसूचित जाति के दिव्यांग अभ्यर्थी के लिए आरक्षित था, जबकि वह सामान्य वर्ग के दिव्यांग उम्मीदवार थे।
हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को खारिज करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि होशियार सिंह को वर्ष 2008 से काल्पनिक वित्तीय लाभ (Notional Benefits) और वरिष्ठता के साथ पीईटी पद पर नियुक्त किया जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि राज्य सरकार तीन महीने के भीतर नियुक्ति पत्र जारी नहीं करती है, तो निर्धारित अवधि के बाद याचिकाकर्ता पूर्ण वेतन पाने का अधिकारी होगा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दिव्यांग श्रेणी के तहत होने वाली भर्ती में प्रदेश का कोई भी पात्र दिव्यांग अभ्यर्थी किसी भी जिले में आवेदन और चयन का अधिकार रखता है। केवल किसी विशेष जिले के उम्मीदवार को प्राथमिकता देना उचित नहीं है।