1991 से 2022 के बीच वनस्पति क्षेत्र 1888 से घटकर 890 वर्ग किलोमीटर हुआ
बर्फ से ढका क्षेत्र 15.20 फीसदी से घटकर महज 3.02 फीसदी रह गया, दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध में खुलासा
कुल्लू। हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ते निर्माण और बदलते भूमि उपयोग का असर अब प्राकृतिक पर्यावरण पर भी दिखाई देने लगा है। कुल्लू जिले में वर्ष 1991 से 2022 के बीच निर्मित क्षेत्र में करीब 4.7 गुना वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि वनस्पति से ढका क्षेत्र आधे से भी कम रह गया है। इतना ही नहीं, इस अवधि में बर्फ से ढके क्षेत्र में भी भारी गिरावट सामने आई है। दिल्ली विश्वविद्यालय के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के भूगोल विभाग से जुड़े शोधकर्ताओं के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। शोधपत्र हाल ही में वैज्ञानिक पत्रिका 'एटमॉस्फियर' में प्रकाशित हुआ है।
239 से बढ़कर 1119 वर्ग किलोमीटर हुआ निर्मित क्षेत्र
अध्ययन के अनुसार, वर्ष 1991 में कुल्लू जिले का निर्मित क्षेत्र 239.81 वर्ग किलोमीटर था, जो कुल क्षेत्रफल का 4.37 फीसदी था। वर्ष 2022 तक यह बढ़कर 1119.28 वर्ग किलोमीटर यानी 20.40 फीसदी हो गया। इस तरह तीन दशकों में निर्माण क्षेत्र में करीब 4.7 गुना विस्तार हुआ है। इसके विपरीत वनस्पति से ढका क्षेत्र 1888.37 वर्ग किलोमीटर से घटकर 890.78 वर्ग किलोमीटर रह गया।
बर्फ से ढके क्षेत्र में भी भारी गिरावट
शोध में एक और चिंताजनक बदलाव सामने आया है। वर्ष 1991 में कुल्लू जिले का 15.20 फीसदी क्षेत्र बर्फ से ढका हुआ था, जो वर्ष 2022 में घटकर महज 3.02 फीसदी रह गया। वहीं, कृषि भूमि का हिस्सा भी 20.83 फीसदी से घटकर 18.02 फीसदी हो गया। दूसरी ओर बंजर भूमि का क्षेत्र 9.44 फीसदी से बढ़कर 16.47 फीसदी तक पहुंच गया।
उपग्रह तस्वीरों और मशीन लर्निंग से किया विश्लेषण
शोधकर्ताओं ने भूमि उपयोग और भूमि आवरण में बदलावों का आकलन करने के लिए वर्ष 1991, 2001, 2011 और 2022 की लैंडसैट उपग्रह तस्वीरों का विश्लेषण किया। मशीन लर्निंग तकनीक की मदद से कृषि भूमि, बंजर भूमि, निर्मित क्षेत्र, बर्फ, वनस्पति और जल निकायों में आए बदलावों का अध्ययन किया गया। विश्लेषण में वनस्पति और कृषि भूमि के कुछ हिस्सों का निर्मित तथा बंजर क्षेत्र में बदलना भी सामने आया है।
शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ, पानी, छाया और मौसमी परिस्थितियों के कारण उपग्रह तस्वीरों के वर्गीकरण में कुछ अनिश्चितताएं हो सकती हैं। अध्ययन के निष्कर्ष पहाड़ी क्षेत्रों में तेजी से बदलते भूमि उपयोग, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और भविष्य की विकास योजनाओं के नियोजन को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े करते हैं।